Purushottam Maas Adhyay 8 Hindi: द्रौपदी के पूर्व जन्म की चौंकाने वाली कथा

Purushottam Maas Adhyay 8 Hindi

Purushottam Maas Adhyay 8 Hindi

सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास को अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी माना गया है। इस मास का महत्व केवल व्रत, दान और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भाग्य, कर्म और भगवान की कृपा से भी जुड़ा हुआ है। पुरुषोत्तम मास माहात्म्य कथा के आठवें अध्याय में एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग मिलता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण पांडवों को द्रौपदी के पूर्व जन्म का रहस्य बताते हैं। यह कथा केवल दुःख और भाग्य की कहानी नहीं, बल्कि पुरुषोत्तम मास के अनादर के परिणाम और भगवान की शरण में जाने की महिमा को भी प्रकट करती है।

नारद और नारायण का दिव्य संवाद

सूतजी कहते हैं कि जब भगवान विष्णु अधिमास को अपने साथ वैकुण्ठ ले गए और उसे सभी महीनों में श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया, तब देवर्षि नारद अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान नारायण से पूछा कि विष्णु के वैकुण्ठ जाने के बाद क्या हुआ। तब भगवान बदरीनारायण ने संसार को आनंद देने वाला यह अद्भुत आख्यान सुनाया। भगवान विष्णु ने अधिमास को अपने समीप स्थान देकर उसे सभी बारह महीनों का राजा बना दिया। यही कारण है कि आज अधिमास को “पुरुषोत्तम मास” कहा जाता है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि जिसे संसार तुच्छ समझता है, भगवान उसी को महान बना सकते हैं।

श्रीकृष्ण ने पांडवों को क्यों समझाया?

वनवास के समय पांडव अत्यंत दुःख और भय में जीवन व्यतीत कर रहे थे। भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे महायोद्धाओं के कारण उनका मन अशांत था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर और द्रौपदी को समझाते हुए कहा कि उन्होंने पुरुषोत्तम मास का आदर नहीं किया, इसलिए उन्हें अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि मनुष्य को अपने भाग्य पर विश्वास रखना चाहिए क्योंकि सुख और दुःख दोनों कर्म एवं अदृष्ट के अनुसार प्राप्त होते हैं। पुरुषोत्तम मास की उपासना जीवन के संकटों को कम करती है और भगवान की विशेष कृपा दिलाती है।

द्रौपदी के पूर्व जन्म का रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि द्रौपदी पूर्व जन्म में मेधावी ऋषि की अत्यंत सुंदर, विदुषी और गुणवती कन्या थीं। उनकी माता का बचपन में ही देहांत हो गया था और पिता ने ही उनका पालन-पोषण किया। कन्या शास्त्रों में निपुण और अत्यंत रूपवती थी, लेकिन विवाह योग्य आयु होने पर भी उसे योग्य वर नहीं मिला। अपनी सखियों को पति और परिवार का सुख भोगते देख उसके मन में भी विवाह और सुखी जीवन की इच्छा जागृत हुई। वह सोचती थी कि कौन-सा देवता उसकी मनोकामना पूर्ण करेगा, किस तीर्थ या ऋषि की शरण लेने से उसे श्रेष्ठ पति मिलेगा और उसका भाग्य इतना प्रतिकूल क्यों है। यह प्रसंग मनुष्य के मानसिक संघर्ष और भाग्य के रहस्य को दर्शाता है।

मेधावी ऋषि की पीड़ा और मृत्यु

अपनी पुत्री के विवाह के लिए मेधावी ऋषि देश-विदेश घूमे, लेकिन उन्हें योग्य वर नहीं मिला। धीरे-धीरे चिंता और दुःख ने उन्हें घेर लिया। एक दिन भयंकर ज्वर से पीड़ित होकर वे घर लौटे और मृत्यु शैया पर लेट गए। अंतिम समय में उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए प्रार्थना की कि हे गोविन्द, हे दीनानाथ, मुझे संसार रूपी दुःख से बचाइए। भगवान के नाम स्मरण का प्रभाव इतना महान था कि विष्णुदूत तुरंत आए और मेधावी ऋषि को वैकुण्ठ ले गए। यह प्रसंग दर्शाता है कि अंतिम समय में भगवान का स्मरण मोक्ष प्रदान करता है।

पिता की मृत्यु पर कन्या का विलाप

पिता की मृत्यु देखकर कन्या अत्यंत दुःखी हो गई। वह रोते हुए कहने लगी कि अब उसकी रक्षा कौन करेगा और उसे किसके सहारे छोड़कर उसके पिता चले गए। उसका करुण विलाप सुनकर वन में रहने वाले सभी ऋषि वहाँ पहुँचे। उन्होंने विधिपूर्वक मेधावी ऋषि का अंतिम संस्कार किया और कन्या को धैर्य बंधाया। लेकिन पिता के वियोग में वह कन्या भीतर से टूट चुकी थी। वह उसी प्रकार दुःखी रहने लगी जैसे बछड़े के बिना गाय व्याकुल रहती है। यह प्रसंग मानव जीवन में संबंधों के महत्व और वियोग के दुःख को अत्यंत भावुकता से प्रस्तुत करता है।

इस कथा से मिलने वाली शिक्षाएँ

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का यह अध्याय हमें अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाएँ देता है। पहली शिक्षा यह है कि पुरुषोत्तम मास का आदर करने से भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। दूसरी शिक्षा यह है कि भाग्य और कर्म दोनों मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तीसरी शिक्षा यह है कि भगवान का स्मरण मोक्षदायी होता है और अंतिम समय में भी भगवान का नाम लेने से जीवन सफल हो जाता है। चौथी शिक्षा यह है कि दुःख और कठिन परिस्थितियाँ भी भगवान की योजना का भाग होती हैं, इसलिए मनुष्य को धैर्य और श्रद्धा बनाए रखनी चाहिए।

पुरुषोत्तम मास में क्या करें?

पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है। इस मास में गीता और भागवत का पाठ करना, दान-पुण्य करना, हरिनाम संकीर्तन करना और सात्विक जीवन व्यतीत करना अत्यंत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से जीवन के पाप नष्ट होते हैं और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

पुरुषोत्तम मास माहात्म्य का आठवाँ अध्याय हमें बताता है that भगवान की कृपा से तुच्छ समझी जाने वाली वस्तु भी महान बन सकती है। यह कथा द्रौपदी के पूर्व जन्म के माध्यम से भाग्य, कर्म, दुःख और भक्ति के गहरे रहस्य को उजागर करती है। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ पुरुषोत्तम मास का पालन करता है, उसके जीवन के संकट धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

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