Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 41

क्या हमारे फोकस की कमी है बहुशाखा बुद्धि का परिणाम?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 41 व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन |बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् || 41 || अर्थात भगवान कहते हैं, हे […]

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 40

क्या थोड़ी सी समता भी जन्म-मरण से मुक्ति दे सकती है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 40 नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् || 40 || अर्थात भगवान

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 39

भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39

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क्या सुख-दुख लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव ही सच्चा धर्म है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 38 सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || 38 || अर्थात

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 37

भगवद गीता हमें क्या सिखाती है कर्तव्य के बारे में?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 37 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || 37

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 35 36

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपमान से क्यों डराया?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 35 36 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 33 34

क्या अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है? गीता से जानें उत्तर

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33 34 अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||

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बर्बरीक

बर्बरीक जी कौन थे? खाटू श्याम जी के रहस्यमयी रूप की कथा

जब भी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का उल्लेख होता है, तो कई दिव्य पात्रों की कहानियाँ सामने आती हैं। इन्हीं

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 32

क्यों भगवान ने युद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 31

स्वधर्म निभाना क्यों है जीवन का सबसे बडा कर्तव्य?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31 || अर्थात भगवान कहते

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 30

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शोक न करने को क्यों कहा?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30 || अर्थात

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Bhagavad Gita Chapter 2 Verse 29

क्या आपने कभी अपने ‘स्वरूप’ को स्वयं जाना है?

Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29 || अर्थात

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