भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है?
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39 […]
भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 39 एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु |बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि || 39 […]
भगवद गीता में ‘समबुद्धि’ का रहस्य क्या है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 38 सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ |ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि || 38 || अर्थात
क्या सुख-दुख लाभ-हानि और जय-पराजय में समभाव ही सच्चा धर्म है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 37 हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् |तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: || 37
भगवद गीता हमें क्या सिखाती है कर्तव्य के बारे में? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 35 36 भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: |येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् || 35
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपमान से क्यों डराया? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 33 34 अथ चेतत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि |तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||
क्या अपकीर्ति मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है? गीता से जानें उत्तर Read Post »
जब भी भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का उल्लेख होता है, तो कई दिव्य पात्रों की कहानियाँ सामने आती हैं। इन्हीं
बर्बरीक जी कौन थे? खाटू श्याम जी के रहस्यमयी रूप की कथा Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 32 यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् । सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ ३२॥ अर्थात भगवान कहते
क्यों भगवान ने युद्ध को स्वर्ग का द्वार कहा? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 31 स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते || 31 || अर्थात भगवान कहते
स्वधर्म निभाना क्यों है जीवन का सबसे बडा कर्तव्य? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 30 देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत |तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि || 30 || अर्थात
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से शोक न करने को क्यों कहा? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 29 आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: |आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोतिश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् || 29 || अर्थात
क्या आपने कभी अपने ‘स्वरूप’ को स्वयं जाना है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 28 अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत |अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना || 28 || अर्थात भगवान कहते
क्या मृत्यु सच में अंत है? Read Post »
Bhagavad Gita Chapter 2 Shloka 27 जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || 27 ||
क्या हम जन्म और मृत्यु को टाल सकते हैं? Read Post »